Rahim Das ke Dohe- अब्दुल रहीम खान-ए-खानान के अनमोल दोहे अर्थ सहित

अब्दुल रहीम खान-ए-खानान, जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘रहीम’ कहा जाता है, मुगल सम्राट अकबर के नवरत्नों में प्रमुख थे। उनका जन्म 1556 में लाहौर में हुआ और 1627 में उनका निधन हो गया। एक कुशल योद्धा, विद्वान और दानवीर के रूप में प्रसिद्ध रहीम ने ब्रज और अवधी भाषा में रचनाएं कीं, जिनमें ‘रहीम सतसई’ और ‘रहीम दोहावली’ प्रमुख हैं। उनके दोहे सरलता से जीवन के सूक्ष्म रहस्यों को उजागर करते हैं – संगति से लेकर प्रेम, धैर्य और परोपकार तक। ये दोहे न केवल साहित्यिक धरोहर हैं, बल्कि दैनिक जीवन के मार्गदर्शक भी। नीचे उनके 50 प्रसिद्ध दोहे दिए गए हैं, प्रत्येक के साथ मूल भावार्थ की सरल व्याख्या। ये दोहे विभिन्न स्रोतों से संकलित हैं, लेकिन व्याख्या मूल रूप से तैयार की गई है ताकि आधुनिक पाठक आसानी से समझ सकें।

असमंजस में जो रहे, सोई बूझे न कोय।
रहीम परमानंद मिटे, न तब लगे सोय।।

अर्थ: दुविधा में फंसा व्यक्ति कुछ समझ नहीं पाता। रहीम बताते हैं कि आनंद तभी समाप्त होता है जब नींद न आए। यह निर्णय लेने की कला सिखाता है, कि संकोच छोड़कर स्पष्टता अपनाएं, क्योंकि अनिर्णय जीवन को स्थिर कर देता है।

रहिमन वे नर अवर नर, जो पर दुख समानन।
जिनके गुण गावें तुलसी, तिन्ह के गुण गावें राम।।

अर्थ: जो दूसरों के दुख को अपना समझते हैं, वही सच्चे मनुष्य हैं। रहीम तुलसीदास से प्रेरित होकर कहते हैं कि ऐसे गुणों की स्तुति स्वयं भगवान भी करते हैं। यह सहानुभूति का संदेश देता है, कि सामूहिक कल्याण ही व्यक्तिगत विकास का आधार है।

बड़े बड़ाई नहिं तजैं, लघु रहीम इतराइ।
राइ करौंदा होत है, कटहर होत न राइ।।

अर्थ: बड़े लोग घमंड न छोड़ें, तो छोटे कैसे विनम्र रहें? रहीम राजा और चमार के उदाहरण से कहते हैं कि घमंड किसी को शोभा नहीं देता। यह समानता की शिक्षा देता है, कि पद-प्रतिष्ठा अस्थायी है, विनम्रता ही स्थायी गुण है।

रहीम छिमा बड़न को, छोटन को उतपात।
भृगु भगति न घट्यौ, घट्यौ मदन अनुराग।।

अर्थ: क्षमा बड़े लोगों को शोभा देती है, छोटों को शरारत। रहीम भृगु और कामदेव की कथा से बताते हैं कि भक्ति कभी कम नहीं होती, लेकिन प्रेम बढ़ता जाता है। यह सहिष्णुता और प्रेम की वृद्धि पर बल देता है।

रहिमन वे बिरछ कहें, जिनकी छाँह गँभीर।
बागन बिच बिच देखिअत, सेंहुड़, कुँज, करीर।।

अर्थ: सच्चे मित्र वे हैं जिनकी छाया गहरी और शीतल हो। रहीम बगीचे में व्यर्थ पेड़ों की तुलना से कहते हैं कि सत्पुरुष उपयोगी होते हैं। यह मित्रता चयन की सलाह देता है, कि गुणवान संगति ही जीवन को समृद्ध करती है।

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय।।

अर्थ: रहीम जी सिखाते हैं कि एक ही लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करें, तो सब कुछ सफल हो जाता है। यदि एक साथ कई काम साधने की कोशिश करें, तो कुछ भी हाथ न लगे। जैसे पेड़ की जड़ में पानी डालने से ही फूल और फल लगते हैं, वैसे ही मूल कार्य पर जोर दें तो समग्र सफलता मिलती है। यह एकाग्रता की शिक्षा देता है, जो जीवन में प्रगति का आधार है।

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।

अर्थ: रहीम जी कहते हैं कि जो व्यक्ति का स्वभाव मूल रूप से शुद्ध और उत्तम होता है, उसे बुरी संगति भी प्रभावित नहीं कर पाती। ठीक वैसे ही जैसे सुगंधित चंदन के पेड़ पर सांप लिपटे रहने पर भी उसका विष उसकी सुगंध को नष्ट नहीं कर पाता। यह दोहा हमें सिखाता है कि आंतरिक गुणों की रक्षा हर बाहरी दुष्प्रभाव से मजबूत होती है, और अच्छे चरित्र वाले व्यक्ति को नकारात्मकता हानि नहीं पहुंचा सकती।

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान।।

अर्थ: बड़े वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, तालाब अपने संचित जल को पीते नहीं – ये प्रकृति के उदाहरण हैं। रहीम बताते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति धन और संपत्ति का संग्रह दूसरों के कल्याण के लिए करते हैं, न कि स्वार्थ के लिए। यह नैतिक शिक्षा देता है कि सच्ची समृद्धि तब होती है जब हमारा संचय समाज की भलाई में लगे, जिससे व्यक्तिगत सुख के साथ सामूहिक उन्नति भी हो।

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रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गाँठ परी जाय।।

अर्थ: प्रेम का बंधन धागे सा नाजुक होता है, इसे क्रोध या झगड़े से न तोड़ें। रहीम चेतावनी देते हैं कि यदि टूट जाए तो पुनः जोड़ना कठिन है, और जोड़े भी तो बीच में गांठ-सी खटक रह जाती है। यह दोहा रिश्तों की नाजुकता पर जोर देता है, सलाह देता है कि धैर्य और संवाद से प्रेम को संभालें, क्योंकि एक बार खराब हुए विश्वास को पूरी तरह बहाल करना असंभव होता है।

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बांटन वारे को लगे, ज्यों मेहंदी को रंग।।

अर्थ: जो व्यक्ति दूसरों के हित के लिए कार्य करता है, वही सच्चा धन्य है। रहीम की दृष्टि में, जैसे मेहंदी बांटने वाले के हाथों पर ही उसका रंग चढ़ जाता है, वैसे ही परोपकार करने वाले का जीवन स्वयं प्रकाशित हो उठता है। यह दोहा दान और सेवा की महत्ता बताता है, कि उदारता न केवल लाभान्वितों को, बल्कि दाता को भी आंतरिक शांति और सम्मान प्रदान करती है।

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून।।

अर्थ: पानी का महत्व जीवन में सर्वोपरि है, बिना इसके सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। रहीम कहते हैं कि पानी चला जाए तो मोती, मनुष्य या चूना – कुछ भी उपयोगी नहीं रहता। यह पर्यावरण और संसाधनों के संरक्षण का संदेश देता है, साथ ही मानवीय संबंधों में ‘विश्वास’ को पानी से जोड़कर बताता है कि बिना विश्वास के रिश्ते सूने हो जाते हैं।

रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहाँ करे तलवारि।।

अर्थ: बड़े व्यक्तियों को देखकर छोटे को तुच्छ न समझें। रहीम उदाहरण देते हैं कि जहां सूई का काम हो, वहां तलवार व्यर्थ है। यह विनम्रता और उपयोगिता की शिक्षा देता है, कि हर चीज या व्यक्ति का मूल्य उसके योगदान से मापें, न कि आकार या दिखावे से। छोटी-छोटी चीजें भी जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

टूटे सुजन मनाइए, जौ टूटे सौ बार।
रहीम फिरि फिरि पिरियै, टूटे मुक्ताहार।।

अर्थ: यदि प्रियजन नाराज हो जाएं, तो उन्हें बार-बार मनाएं, चाहे सौ बार क्यों न हो। रहीम मोतियों की माला से तुलना करते हैं कि टूटने पर भी इन्हें पुनः पिरोना चाहिए, क्योंकि ये हमेशा आकर्षक रहती हैं। यह क्षमा और धैर्य का पाठ पढ़ाता है, कि रिश्तों को बचाने के लिए प्रयास कभी व्यर्थ नहीं होते।

निज कर क्रिया रहीम कहि, सुधि भाव के हाथ।
पाँसे अपने हाथ में, दॉंव न अपने हाथ।।

अर्थ: कर्म हमारे हाथ में है, लेकिन फल भाग्य पर निर्भर। रहीम चौपड़ के खेल से उदाहरण देते हैं – पांसे फेंकना हमारा है, लेकिन दांव का परिणाम नहीं। यह कर्मयोग का सार है, कि प्रयास करें लेकिन परिणाम की चिंता न करें, क्योंकि नियति अंतिम निर्णायक होती है।

प्रीतम छबि नैनन बसी, पर छवि कहाँ समाय।
भरी सराय रहीम लखि, पथिक आप फिर जाय।।

अर्थ: प्रेमी की छवि आंखों में बसी रहती है, तो अन्य छवियों के लिए स्थान कहां? रहीम सराय के भरे होने से यायावर के लौट जाने की तुलना करते हैं। यह प्रेम की एकनिष्ठता बताता है, कि सच्चा प्रेम हृदय को इतना भर देता है कि बाहरी आकर्षणों की कोई गुंजाइश नहीं बचती।

रहिमन बिनु सत्संग नहि, जो कछु भलो करही।
जौ न भलो तो कछु नहि, कछु भलो करही।।

अर्थ: सत्संग के बिना कोई अच्छा कार्य संभव नहीं। रहीम कहते हैं कि यदि संगति बुरी हो तो कुछ भी शुभ नहीं होता। यह अच्छी संगति की महत्ता पर जोर देता है, कि सकारात्मक वातावरण ही हमें नैतिक ऊंचाइयों तक ले जाता है, जबकि नकारात्मकता सब कुछ नष्ट कर देती है।

समय पाय फल होत है, समय पाय झरी जात।
सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछितात।।

अर्थ: फल लगना और झड़ना समय पर निर्भर है। रहीम बताते हैं कि जीवन की स्थिति कभी स्थिर नहीं रहती, इसलिए दुख के समय पछतावा व्यर्थ है। अच्छे दिन अवश्य आएंगे। यह धैर्य और समय की महत्वपूर्णता पर जोर देता है, जो कठिनाइयों में आशा जगाता है।

बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥

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अर्थ: यदि कोई बात बिगड़ जाए, तो लाख प्रयासों से भी न सुधरे। जैसे फटा दूध मथने से घी न निकले, वैसे ही खराब हुई स्थिति को सुधारना असंभव। रहीम सावधानी बरतने की सलाह देते हैं, कि विवेकपूर्ण व्यवहार से ही संबंध मजबूत रहते हैं।

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि॥

अर्थ: बड़े को देखकर छोटे को तुच्छ न समझें। जहां सूई पर्याप्त हो, वहां तलवार बेकार। रहीम विनम्रता सिखाते हैं कि हर वस्तु या व्यक्ति का मूल्य उसके उपयोग से है, न कि आकार से। यह समानता और सम्मान का संदेश देता है।

रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।
सुनि इठलैहैं लोग सब, बाटि न लैहै कोय॥

अर्थ: अपने मन की पीड़ा को हृदय में ही रखें। रहीम चेताते हैं कि दूसरों को बताने पर लोग मजाक उड़ाते हैं, सहानुभूति न दिखाते। यह आत्मसंयम की शिक्षा देता है, कि आंतरिक शक्ति से ही दुख सहन करना सीखें।

छिमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥

अर्थ: क्षमा बड़े को शोभा देती है, छोटे को शरारत। जैसे भृगु ने विष्णु को लात मारी, फिर भी हरि का वैभव कम न हुआ। रहीम सहिष्णुता पर बल देते हैं, कि उदारता से ही महानता सिद्ध होती है।

जैसी परे सो सहि रहे, कहि रहीम यह देह।
धरती ही पर परत है, सीत घाम औ मेह।।

अर्थ: जो भी आए, उसे सहन करें। जैसे पृथ्वी सर्दी, गर्मी और वर्षा सब सहती है। रहीम शरीर को धरती से तुलना कर धैर्य सिखाते हैं, कि जीवन के उतार-चढ़ाव स्वाभाविक हैं।

पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौन।
अब दादुर वक्ता भए, हमको पूछे कौन।।

अर्थ: वर्षा में कोयल और रहीम का मन मौन हो जाता है। अब मेंढक ही वक्ता बनते हैं, हमारी बात कौन सुनेगा। यह दर्शाता है कि कुछ परिस्थितियों में गुणवान को चुप रहना ही उचित, क्योंकि अवसरानुसार ही मूल्य मिलता है।

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय।।

अर्थ: बिगड़ी बात लाख प्रयासों से न बने। फटे दूध से घी न निकले, जैसे। रहीम सतर्कता की सलाह देते हैं, कि बुद्धिमत्ता से ही संबंधों की रक्षा करें।

रहिमन अंसुवा नयन ढरि, जिय दुःख प्रगट करेइ।
जाहि निकारौ गेह ते, कस न भेद कहि देइ।।

अर्थ: आंसू बहने से हृदय का दुख प्रकट हो जाता है। घर से निकाले गए व्यक्ति का भेद वह अवश्य बता देगा। रहीम गोपनीयता और विश्वास पर जोर देते हैं।

मन मोटी अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय।
फट जाये तो न मिले, कोटिन करो उपाय।।

अर्थ: मन, मोती, दूध, रस – इनका स्वाभाविक रूप ही सुंदर। एक बार बिगड़ जाएं, तो करोड़ उपायों से न सुधरें। रहीम नाजुक संतुलन बनाए रखने की शिक्षा देते हैं।

विरह रूप धन तम भये अवधि आस ईधोत।
ज्यों रहीम भादों निसा चमकि जात खद्योत॥

अर्थ: वियोग में अंधकार गहरा, लेकिन भादों में जुगनू आशा जगाते। रहीम आशावाद देते हैं।

आदर घटे नरेस ढिग बसे रहे कछु नाॅहि।
जो रहीम कोरिन मिले धिक जीवन जग माॅहि॥

अर्थ: सम्मानहीन स्थान पर न रहें, करोड़ मिले तो भी धिक्कार। रहीम आत्मसम्मान पर जोर देते हैं।

पुरूस पूजै देबरा तिय पूजै रघुनाथ।
कहि रहीम दोउन बने पड़ो बैल के साथ॥

अर्थ: पति देवताओं, पत्नी राम की पूजा – संतुलन से गृहस्थी चले। रहीम वैवाहिक समन्वय सिखाते हैं।

धन दारा अरू सुतन सों लग्यों है नित चित्त।
नहि रहीम कोउ लरवयो गाढे दिन को मित्त॥

अर्थ: चित्त धन-संतान पर न लगाएं, विपत्ति में वे न सहारा। ईश्वर ही मित्र। रहीम आध्यात्मिक एकाग्रता पर बल।

रहिमन कुटिल कुठार ज्यों करि डारत द्वै टूक।
चतुरन को कसकत रहे समय चूक की हूक॥

अर्थ: कटु वचन कुल्हाड़ी सा दो भाग कर दें। चतुर समय पर जवाब छोड़ें। रहीम संयम और धैर्य की शिक्षा देते हैं।

जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह।
रहिमन मछरी नीर को तऊ न छाँड़ति छोह॥

अर्थ: जाल से पानी निकल जाता, लेकिन मछली जल का मोह न छोड़ती। रहीम प्रेम की गहनता बताते हैं, जो अलगाव में भी बंधन बनाए रखता है।

विपति भये धन ना रहै रहै जो लाख करोर।
नभ तारे छिपि जात हैं ज्यों रहीम ये भोर।।

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अर्थ: विपत्ति में धन लाखों का भी न रहे। जैसे भोर में तारे छिप जाते। रहीम अस्थायित्व पर चेताते हैं, कि सच्ची शक्ति आंतरिक होनी चाहिए।

ओछे को सत्संग रहिमन तजहु अंगार ज्यों।
तातो जारै अंग सीरै पै कारौ लगै।।

अर्थ: नीच संगति को त्यागें, जैसे अंगारा – गर्म हो तो जलाए, ठंडा हो तो काला करे। रहीम बुरी कंपनी से हानि की चेतावनी देते हैं।

रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली न प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँती विपरीत।।

अर्थ: नीच से न शत्रुता अच्छी, न मित्रता। कुत्ता काटे या चाटे, दोनों हानिकारक। रहीम सत्संग की महत्ता पर बल देते हैं।

लोहे की न लोहार की, रहिमन कही विचार जा।
हनि मारे सीस पै, ताही की तलवार।।

अर्थ: तलवार न लोहे की, न लोहार की – वीर की, जो शत्रु का सिर काटे। रहीम गुण की प्रधानता बताते हैं।

तासों ही कछु पाइए, कीजे जाकी आस।
रीते सरवर पर गए, कैसे बुझे पियास।।

अर्थ: आशा उसी से करें, जो दे सके। सूखे तालाब से प्यास न बुझे। रहीम विवेकपूर्ण अपेक्षाओं की सलाह देते हैं।

माह मास लहि टेसुआ मीन परे थल और
त्यों रहीम जग जानिए, छुटे आपुने ठौर।।

अर्थ: माघ में पलाश खिलता, मछली थल पर मरती। जैसे, स्थान से हटने पर स्थिति बदल जाती। रहीम अनुकूलन की शिक्षा देते हैं।

थोथे बादर क्वार के, ज्यों ‘रहीम’ घहरात।
धनी पुरुष निर्धन भये, करैं पाछिली बात॥

अर्थ: क्वार के बादल गरजते, वर्षा न करते। जैसे गरीब अमीर पिछली बातें करता। रहीम वर्तमान पर फोकस सिखाते हैं।

संपत्ति भरम गंवाई के हाथ रहत कछु नाहिं।
ज्यों रहीम ससि रहत है दिवस अकासहि माहिं।।

अर्थ: मोह में संपत्ति गंवाने से हाथ खाली। जैसे दिन में चंद्रमा रहता, दिखता न। रहीम संयम की सलाह देते हैं।

साधु सराहै साधुता, जाती जोखिता जान।
रहिमन सांचे सूर को बैरी कराइ बखान।।

अर्थ: साधु साधु की, योद्धा जोखिम की प्रशंसा। सच्चे वीर की शत्रु भी बड़ाई। रहीम सत्य गुणों की महिमा गाते हैं।

वरू रहीम कानन भल्यो वास करिय फल भोग।
बंधू मध्य धनहीन ह्वै, बसिबो उचित न योग।।

अर्थ: वन में फल खाकर रहना बेहतर, धनहीन होकर बंधुओं में न। रहीम स्वावलंबन पर जोर देते हैं।

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥

अर्थ: विनम्रता (पानी) रखें, बिना उसके सब व्यर्थ। मोती की चमक, मनुष्य का मूल्य, चूने का गुण – सब पानी पर निर्भर। रहीम विनम्रता की त्रिविध शिक्षा देते हैं।

रहिमन रीति सराहिए, जो घट गुन सम होय।
भीति आप पै डारि के, सबै पियावै तोय।।

अर्थ: घड़ा-रस्सी की रीति सराहनीय – टूटने के भय से भी पानी पिलाते। रहीम परोपकार की प्रेरणा देते हैं।

जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटी जाहिं।
गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं।।

अर्थ: बड़े को छोटा कहने से वैभव कम न हो। कृष्ण को मुरलीधर कहने से दुख न। रहीम अटल महिमा पर विश्वास सिखाते हैं।

धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पिअत अघाय।
उदधि बड़ाई कौन हे, जगत पिआसो जाय॥

अर्थ: कीचड़ का पानी भी धन्य, जो छोटे जीव तृप्त करे। समुद्र का जल व्यर्थ। रहीम उपयोगिता पर बल देते हैं।

अब रहीम मुसकिल परी गाढे दोउ काम।
सांचे से तो जग नहीं झूठे मिलै न राम।।

अर्थ: सत्य से संसार न चले, असत्य से राम न मिले। रहीम आध्यात्मिक द्वंद्व पर चिंतन कराते हैं।

मांगे मुकरि न को गयो केहि न त्यागियो साथ।
मांगत आगे सुख लहयो ते रहीम रघुनाथ।।

अर्थ: मांगने पर कोई न मुकरा, त्यागी साथ न छोड़ा। आगे मांगने से सुख मिला, जैसे रघुनाथ को। रहीम भक्ति की सरलता बताते हैं।

जेहि अंचल दीपक दुरयो हन्यो सो ताही गात।
रहिमन असमय के परे मित्र शत्रु ह्वै जात॥

अर्थ: आंचल से दीपक बचाने वाली रात में बुझा दे। जैसे मित्र विपत्ति में शत्रु। रहीम समयबद्ध संबंधों पर चेताते हैं।

समय लाभ सम लाभ नहि समय चूक सम चूक।
चतुरन चित रहिमन लगी समय चूक की हूक॥

अर्थ: समय का लाभ सर्वोत्तम, चूक सबसे बड़ी। चतुर को चूक की चुभन सताती। रहीम अवसरारोहण सिखाते हैं।

ये दोहे रहीम जी की अमूल्य निधि हैं, जो जीवन को दिशा देते हैं। यदि कोई विशेष दोहा पसंद आया, तो बताएं। अधिक प्रेरणा के लिए जुड़े रहें!

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