दुर्गा पूजा हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जो शक्ति की देवी माँ दुर्गा की आराधना के रूप में मनाया जाता है। यह उत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सांस्कृतिक एकता और सामाजिक सद्भाव का भी माध्यम बनता है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और बांग्लादेश में इसकी भव्यता देखते ही बनती है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में आयोजित होने वाला यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है। इस निबंध में हम दुर्गा पूजा के इतिहास, महत्व, उत्सव की रस्मों और सामाजिक प्रभाव पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
दुर्गा पूजा का परिचय
दुर्गा पूजा, जिसे दुर्गोत्सव भी कहा जाता है, हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन माह (सितंबर-अक्टूबर) में मनाया जाता है। यह नौ रात्रियों (नवरात्रि) का विस्तार है, लेकिन मुख्य रूप से पांच दिनों – षष्ठी से विजयादशमी तक – की धूम रहती है। माँ दुर्गा को स्त्री शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जो असुरी शक्तियों का नाश करती हैं। यह पर्व भारत के पूर्वी भागों में सांस्कृतिक उत्सव के रूप में प्रसिद्ध है, जहां पंडालों में मूर्तियों की स्थापना, संगीत, नृत्य और भोज का आयोजन होता है। दुर्गा पूजा केवल पूजा नहीं, बल्कि समृद्धि, एकता और नई शुरुआत का प्रतीक है।
दुर्गा पूजा का इतिहास
दुर्गा पूजा का इतिहास प्राचीन पौराणिक कथाओं से जुड़ा है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार, देवताओं ने मिलकर माँ दुर्गा का सृजन किया था ताकि वे राक्षस महिषासुर का वध करें। महिषासुर ने देवताओं को पीड़ित किया था, और माँ दुर्गा ने नौ दिनों तक युद्ध के बाद दशमी तिथि पर उसका संहार किया। यह घटना बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक बनी।
ऐतिहासिक रूप से, दुर्गा पूजा की भव्यता 18वीं-19वीं शताब्दी में बंगाल के जमींदारों द्वारा शुरू हुई। ब्रिटिश काल में उन्होंने इसे सामाजिक प्रदर्शन का माध्यम बनाया, जब यह केवल घरों में सीमित थी। आज यह यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल है, जो इसके वैश्विक महत्व को दर्शाता है। प्राचीन काल से ही रामायण में भी भगवान राम ने रावण वध से पहले दुर्गा पूजा की थी, जो इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है।
दुर्गा पूजा का धार्मिक महत्व
दुर्गा पूजा का धार्मिक महत्व अत्यंत गहन है। यह शक्ति उपासना का पर्व है, जो स्त्री शक्ति को सम्मान देता है। निम्नलिखित बिंदुओं में इसका महत्व स्पष्ट होता है:
- बुराई पर अच्छाई की विजय: महिषासुर वध की कथा से प्रेरित, यह पर्व नैतिक मूल्यों की शिक्षा देता है।
- शक्ति की आराधना: माँ दुर्गा के नौ रूपों (नवदुर्गा) की पूजा से भक्तों को आध्यात्मिक शांति मिलती है।
- नवरात्रि का विस्तार: नौ दिनों में उपवास, जप और ध्यान से पापों का नाश होता है।
- विजयादशमी का संदेश: दशमी को राम की रावण पर विजय के रूप में भी मनाया जाता है, जो सत्य की रक्षा का प्रतीक है।
यह पर्व भक्तों को जीवन में साहस और धैर्य सिखाता है, तथा देवी की कृपा से समृद्धि प्रदान करता है।
दुर्गा पूजा के प्रमुख दिन और रस्में
दुर्गा पूजा के उत्सव की शुरुआत महालया से होती है और विजयादशमी पर समापन। प्रत्येक दिन की विशेषताएं निम्न हैं:
महालया (महालयाम)
- पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण किया जाता है।
- सुबह चंडी पाठ और देवी महात्म्य का पाठ होता है।
- यह दिन नई ऊर्जा का प्रारंभ माना जाता है।
षष्ठी (Shashthi)
- मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा की रस्म।
- अविरभोग और भोग अर्पण।
- पंडालों में स्वागत समारोह।
सप्तमी (Saptami)
- कुमारी पूजा, जहां युवतियों को देवी रूप में पूजा जाता है।
- ब्रह्म मुहूर्त में स्नान और ध्येय ध्यान।
- फूलों और पत्तों से सजावट।
अष्टमी (Ashtami)
- संध्या काल में कुमारी पूजा और धुनुची नृत्य।
- मंत्रोच्चार के साथ होम यज्ञ।
- सबसे भव्य दिन, जहां भक्त जागरण करते हैं।
नवमी (Navami)
- मांभोज और गरबा नृत्य।
- नवमी होम, जिसमें अग्नि में आहुति दी जाती है।
- संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम।
विजयादशमी (Vijaya Dashami)
- विदाई समारोह और विसर्जन यात्रा।
- सिंदूर खेला रस्म, जहां महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं।
- रावण दहन और रामलीला।
ये रस्में उत्सव को जीवंत बनाती हैं।
दुर्गा पूजा की तैयारियां
दुर्गा पूजा की तैयारियां महीनों पहले शुरू हो जाती हैं। प्रमुख बिंदु:
- मूर्ति निर्माण: कुशल कारीगर मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से मूर्तियां बनाते हैं।
- पंडाल सज्जा: थीम आधारित पंडाल, लाइटिंग और कलात्मक डिजाइन।
- सांस्कृतिक आयोजन: धुनुची नाच, रबींद्र संगीत और थिएटर शो।
- भोजन व्यवस्था: भोग प्रसाद में खिचड़ी, लुची और मिठाइयां।
- समुदाय भागीदारी: पड़ोसवासी मिलकर फंड इकट्ठा करते हैं।
दुर्गा पूजा का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
दुर्गा पूजा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक उत्सव भी है। पश्चिम बंगाल में यह अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है, लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है। यह पर्व लैंगिक समानता को बढ़ावा देता है, क्योंकि देवी पूजा स्त्री सशक्तिकरण का संदेश देती है। सांस्कृतिक रूप से, यह बंगाली कला, संगीत और साहित्य को जीवित रखता है। वैश्विक स्तर पर, यह भारतीय संस्कृति का प्रतीक बन चुका है।
निष्कर्ष
दुर्गा पूजा एक ऐसा पर्व है जो आस्था, संस्कृति और एकता का संगम है। माँ दुर्गा की कृपा से हम बुराई पर विजयी होकर नई ऊर्जा प्राप्त करते हैं। इस उत्सव से हमें जीवन में सकारात्मकता और शक्ति का संचार होता है। आइए, हम सभी इस पर्व को हर्षोल्लास से मनाएं और समाज में सद्भाव फैलाएं। दुर्गा पूजा की शुभकामनाएं!